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अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर सरकारी शिकंजे की राह आसान नहीं,
सुप्रीमकोर्ट की बड़ी बेंच से है इंसाफ की उम्मीद

(हमीदुल्लाह सिद्दीकी,लखनऊ)
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा “पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा अधिनियम 2008’’ को वैध ठहराए जाने के बाद से ही देश के दीगर प्रदेशों में मदरसे से जुड़े लोगों की बेचैनी भले ही बढ़ गई हो ,मगर उम्मीद अभी भी कायम है । सुप्रीमकोर्ट के दो जजों की बेंच के हालिया फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल हो जाने से कानून के जानकारों को एक उम्मीद जगी है । मदरसा संचालकों को भी यह यकीन है कि मामले की सुनवाई जब बड़ी बेंच में होगी तो अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा ज़रूर होगी । पिछले 6 जनवरी को सुप्रीमकोर्ट ने अपने एक फैसले में पश्चिम बंगाल के सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की भर्ती एक आयोग के जरिए ही होने को जायज़ ठहराया था ,जिसके खिलाफ मदरसा प्रबंध समिति की ओर से सुप्रीमकोर्ट में इस फैसले को चैलेंज किया गया । प्रबंध समिति की पैरवी कर रहे मशहूर वकील सलमान खुर्शीद ने चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच के सामने अपनी दलील पेश करते हुए पूरे मामले की सुनवाई लार्जर बेंच में किए जाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। सलमान खुर्शीद कोर्ट को यह सनझाने में कामयाब रहे कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्थापना और संचालन से संबंधित पूर्व में 5,7,9 और 11 जजों की बेंच ने जो फैसले किए हैं उन्हें 2 जजों की बेंच खारिज या नजरअंदाज नहीं कर सकती ।
कानून के जानकार बताते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंखयकों को अपनी पसंद के हिसाब से शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनके संचालन का अधिकार है और सरकार, प्रबंध समिति के प्रशासनिक अधिकारों को छीन नहीं सकती । न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने 6 जनवरी को 151 पेज के अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट के पूर्व के कई फैसलों का हवाला तो दिया है मगर अपनी पसंद के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनके संचालन के अधिकार को स्पष्ट नहीं किया । कोर्ट का यह फैसला खुद उसके पूर्व के फैसलों से मैच नहीं खाता है । 25 सिंतबर 2019 का चंदाना दास का जजमेंट उसकी एक मिसाल है जिसमें पश्चिम बंगाल के सिखों को उनके शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार प्रबंध समिति को दिया गया है ।“पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा अधिनियम 2008 उसके उलट है। इसमें कहा गया है कि सरकार जब मदरसा शिक्षकों को अनुदान दे रही है तो उन्हें नियुक्ति करने और अपने नियम लागू कराने का भी अधिकार है। यदि कोई मदरसा,आयोग की सिफारिशों व आदेशों का उल्लघन करता है तो उसकी ग्रांट रोकी जा सकती है और उसका रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है
सुप्रीमकोर्ट के 7 जजों की एक बेंच ने 1967 के अपने एक फैसले में धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की हितों की व्यापक व्याख्या की है । जिसमें अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान खोलने और चलाने की पूरी आज़ादी दी गई है । बिहार मदरसा एजूकेशन बोर्ड 1990 के नियम को भी सुर्प्रीमकोर्ट ने असंवैधानिक मानते हुए कहा था कि सरकार अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के प्रशासनिक अधिकार को छीन नहीं सकती ।
पश्चिम बंगाल की सरकार 12 अक्टूबर 2017 को नोटीफिकेशन जारी कर के राज्य के सभी अनुदानित मदरसों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा दे चुकी है,इस लिए सदरसा संचालकों की यह मांग है कि उन्हें भी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं की तरह ही सभी अधिकार मिलने चाहिए ।सन 2003 में सुप्रीमकोर्ट की 11 जजों की बेंच ने अपने एक फैसले में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के अधिकारों की विशेष उल्लेख किया है । कोर्ट ने माना है कि प्रबंध समिति अपने प्रशासनिक अधिकारों के तहत अपनी एक एक गवर्निंग बाडी चुन सकती है,शिक्षकों की नियुक्ति और छात्रों का दाखिला कर सकती है ।प्रबंध समिति को फीस तय करने और डिसिपिलिन बरकरार रखने के लिए कुछ ज़ाबते बनाने का भी अधिकार होगा । लेकिन अब सवाल यह उठता है कि सरकार द्वारा बनाए गए नियम कानून मानने के लिए मदरसे कितने जवाबदेह हैं। तो यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि शिक्षा की गुणवत्ता,शिक्षकों की योग्यता ,उम्र,सेहत,साफ-सफाई आदि जैसे मामलों में बेहतरी लाने से संबंधित सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करना है मदरसों की जिम्मेदारी है । लेकिन सरकार कोई ऐसा आदेश नहीं पारित कर सकती है जिससे शिक्षण संस्थानों के अल्पसंख्यक किरदार पर चोट पहुंचती हो ।



